शनिवार, 26 दिसंबर 2009
बस्तर पर तीन कविताएँ
जनमानस
उद्वेलित है
पहले
सरकार,
गैर सरकारी संस्थाएँ,
साहूकार
उनके विकास के लिये
कृत संकल्पित थे
अब उन्हें
नक्सलियों के छॉंव तले
विकास करना है
बाप
पहले के साथ है
बेटा
नक्सलियों के साथ
और
मॉं बेटी सलवाजूडूम केम्प में ।
अब तो
उन्हे भी पता चल चुका है
विकास तो उन्हें करना ही होगा
चाहे धरती पर
चाहे स्वर्ग में
………………………………
2
भय
पहले भी नहीं था
उनके जीवन में
अब भी नहीं है
पहले
जंगल में
जिस जिस को
बाघ मिला
वह अपना अनुभव बॉंटने
गॉंव नहीं लौटा
आज जो
अपना दुख भी जाहिर करता है
गॉव में
उसे नक्सली मिलते हैं
अपने ही पहरावे में
अपनी ही भाषा बोलते हुए
अब उन्हें न बाघ से भय है
और
न नक्सलियों से
क्योंकि
वे जान गये हैं
दोनो क्या करते हैं
………………………
3
मेरे भीतर
एक बडा सा पोस्टर टंगा है
जिसमें लिखा है
“बस्तर जाना व्यर्थ है”
सरकारी योजनाएँ
चल नहीं पातीं
अपन तो बालबच्चेदार हैं
घर गृहस्थी कैसे चलेगी ।
आदिवासी सौन्दर्य
किसी कीमती कैमरे में
टापलेस
कैद होने के लिये
अप्रस्तुत हैं
घोटुल का
अघोषित रूप से
सरकारीकरण हो चुका है
अपन तो कलाकार हैं
रंग, व्यापार कैसे चलेगा ।
मेरा जी तो करता है
पोस्टर को
सबकी जानकारी के लिये
बस्तर जाने वाली सडक पर
बीचों बीच
टॉंग दूँ ।
……………………………
रविवार, 29 नवंबर 2009
परियों का देश थाईलैंड

कहते हैं पुरानी पीढ़ी का अनुभव नई पीढ़ी के लिये कथा कहानी या गल्प से अधिक मायने नहीं रखती । वर्तमान का खट्टा मीठा स्वाद सजीव होता है, जबकि भूत जो वर्तमान के काँधे चढ़कर आता है, सूचना बनकर सरोकारों तक बिखरता तो है पर उसमें ताजे फूल की खुशबू नहीं होती । इसे हम चाहे दो पीढ़ीयों का सहज अंतर कहें या कि विकास यात्रा की स्वाभाविक परिणति । ज्ञान सदैव अनुभूति सापेक्ष ही होता है, हालाँकि चेतना के लिये अनुभूति भी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रेषित सूचना ही होती है ।
थाईलेण्ड को मैंने अप्रत्याशित रुप से वर्तमान में पाया । आधुनिकता का जो रंग उस पर चढ़ रहा है वह आश्चर्यजनक है । युवा सामने हैं , बुजूर्ग ओझल हैं । पुरातन लोहे से भी अधिक मजबूत सागौन लकड़ी निर्मित छोटे छोटे घर नदारत हैं, गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ विखरी पड़ी हैं, । आधुनिकता की चमक, दमक , आज के बाजार से आकर्षित जीवन शैली और नील गगन में उँचाई पर उड़ते पंक्षी के तरह की उन्मुक्तता थाईलेण्ड के निवासियों के तन और मन दोनो में गहराई तक समायी हुई है । भगवान तथागत यहाँ के प्राणों मे बसे थे , अब मंदिरों तक सीमित रह गये हैं, या फिर उन्होंने गैरिक वस्त्रों में यदा कदा ही प्रकट हो पाने वाले भिक्षुओं की सीमा में रहना सीख लिया है । उनकी शिक्षाएँ मंदिरों के गर्भगृहों में भविष्य के लिये जब देश निकट अतीत की गरीबी और निशक्तता से उबर जायेगा, सुरक्षित रख लिये गये हैं । पुरुष वर्ग निर्यातोन्मुख कल कारखानो की दिनोंदिन बढ़ती इकाईयों में खप गया है और महिलाएँ पर्यटन उद्योग की निरन्तर बढ़ती आवश्यकता के अनुरुप सेवा के हर क्षेत्र में अपने गौरवर्णीय छबि और चेहरे पर हर समय खेलती मंदस्मित लिये सन्नद्ध हो गई हैं । इस क्रियाकलाप में शरीर को भोग की वस्तु के रुप में परोसकर अपनी आर्थिक सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करने में किसी नैतिक बंधन को अस्वीकार करने में उन्हें कत्तई भी हिचक नहीं होती । यह सब कुछ यहाँ के स्त्री वर्ग के लिये सहज रुप में स्वीकार्य है । स्त्री सुलभ लाज की लाली यदा कदा आकर्षण को और अधिक प्रभावी करने की भंगिमा के रुप में उभरते दिखती है , अन्यथा इनका निर्विकार चेहरा उनके किसी मशीन की तरह की संलग्नता को प्रदर्शित करती है ।
पहली बार में तो भारतीय मानस, जिसमें मर्यादा, नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और आदर्शों की छाप पीढ़ी दर पीढ़ी उतरती आ रही है , थाईलेण्ड जाकर अचम्भित हो जाता है । उसका वर्जनाओं में जीने वाला मन एकाएक उन्मुक्त होने में संकोच का अनुभव करता है । हालाँकि उन्मुक्तता का अपना अलग स्वाद और आकर्षण है जो आखिरकार उसे उसके संकोच से बाहर ले ही आती है । उँची उँची अट्टालिकाएँ, मीलों लम्बी फ्लाईओवरों और जाम में फंसी विदेशी कारों की लम्बी कतारें विकास के पथ पर दौड़ती अर्थव्यवस्था का भान कराती हैं, परन्तु जब विदेशी निवेश और सैलानी आधारित अर्थतंत्र के चमक दमक का तथ्य सामने आता है, तथाकथित विकास का पोल खुलती दिखती है । लगता है थाईलेण्ड के पास खेत खलिहान, आकर्षक समुद्री तट और सुन्दर, आमन्त्रण देती थाई देह की ही पूंजी है ।
थाईलेण्ड का ज्ञात इतिहास मात्र ७५० वर्षों का ही है । उसके पहले लगभग अंधकार युग था । इस देश में भगवान बुद्ध का संदेश इसी अंधकार युग में आया और फैला था । भारतीय संस्कृति के अवशेष भी जहाँ तहाँ आज भी दिखलाई पड़ जाते हैं , परन्तु शायद थाई वासियो को अब इसका ज्ञान नहीं रहा । आज तो भगवान बुद्ध थाई हैं और भगवान राम भी थाई हैं । थाईलेण्ड में अयोध्या । अयुधाया । नामक एक शहर है, जो अतीत में इस देश की राजधानी रही है । भारत में हों या न हों पर यहाँ के राजा आज भी राम ही हैं । वर्तमान राजा नौवे रामा कहे जाते है ।
अपने अतीत से, इतिहास से कटकर किसी समाज या राष्ट्र की क्या दुर्दशा होती है ? थाईलेण्ड इसका जीवंत उदाहरण है । इस देश की इस अवस्था के लिये अन्य कारकों में ब्रिटिश, फ्रेंच, डच और अमरीकियों द्वारा किया गया आर्थिक और सामाजिक शोषण रहा है । अमरीकियों ने तो इस देश के निवासियों का दैहिक शोषण कर इनको नैतिक अवमूल्यन के गहरे अंधे कुएँ में धकेल दिया, जहाँ से संसार दिखना बंद हो गया और इन्होने अपनी स्थिति से समझौता कर इसे ही सच मान लिया । भगवान जाने नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना इस देश में कब हो पायेगी, या कि हो भी पायेगी कि नहीं । कुछ कहा नहीं जा सकता भविष्य के आँचल में क्या छुपा है । हाँ यह जरुर है, आज इस देश ने अपनी निशक्तता, जिसके कारण अपनी महिलाओं को अमरीकी दैहिक शोषण से नहीं बचा पाये थे , को इन्होने अपना हथियार बना लिया है और उन्हीं अमरीकियों को काम जाल में फाँस कर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारते हुए उनमें नैतिक अवमूल्यन का बीज बो रहे हैं । इस फाँस में भारतीय सैलानियों का उलझना अवश्य ही चिन्ता का विषय है ।
दक्षिण पूर्वी एशिया के इस छोटे से देश के निवासियों का रंग युरोपियन गोरेपन से उन्नीस ही बैठता है । कद काठी में इनकी गणना सामान्य से कुछ छोटे कद की ही की जायेगी । सन्तुलित देह और मीठी जुबान इनकी सुन्दरता को चार चाँद लगा देता है । आम कामकाजी स्त्रियाँ आकर्षित तो करती ही हैं और जब श्रृँगार व परम्परागत नृत्य की वेशभूषा में ये मँच पर उतरती हैं तो परियों से कम नहीं लगतीं । एक बात जरुर अनुभव होती है, वह है थाई सुन्दरियों के तरकस में कामदेव के वाणों की अनुपस्थिति । ये आकर्षित तो करती हैं परन्तु घायल नहीं करतीं । ये न तो कटाक्ष के तीर चलाने!मारने में उस्ताद हैं और न रुपगर्विता के से भाव रखती हैं ।
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रविवार, 11 अक्टूबर 2009
तुम्हारा नाम
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।
बहककर है आ गया
मेरे दुआरे
अन्य बागों से मधुर मलयी पवन
बिछ रहे पथ में
अतुल विश्वास लेकर
किस अदेखे ताल से ये
भीगकर आये नयन ।
हर सुलगते शब्द ने
आकर किया है
फिर मुझे बदनाम ।
फिर बिछलती साँझ ने
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।
दूर शाखों में बसी
वह गंध
भरमाती रही है
बंद पलकों में
तुम्हारी याद
तरसाती रही है
इक सुखद अहसास है
सालता
मुझको अजाना
अधजनी अनुभूतियों में
आस
ललसाती रही है ।
अ नियंत्रित
पग कसकते
चाहते विश्राम ।
फिर बिछलती साँझ ने
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।
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रविवार, 4 अक्टूबर 2009
बाजार से डरना मना है
बाजार में आयी यह जवानी जो आज उफान पर दिखती है, यह इसका सर्वथा नया रुप है । बाजार कभी भी इतना व्यापक नहीं था। यह स्वच्छंद भी नहीं था । इसकी सीमा थी । यह सैकड़ों बरस तक समय, काल, स्थान, क्षेत्र आदि से बंधा हुआ था । साप्ताहिक हाट एवं वार्षिक मेला लम्बे समय तक बाजार के रुप में स्थापित रहे हैं । लेकिन यह उस समय भी अपने प्रति ललक पैदा करने में सक्षम हुआ करता था । इसे देखने, छूने, और इसके साथ तादात्म्य स्थापित करने की इच्छा से हर उम्र के लोग बाजार में आते थे । जवानी की दहलीज पर पाँव रखती कुमारियाँ जिनमें अपने सौंदर्य का अहसास बोध कुलबुलाने लगता था, अपने रुप को संवारने, सजने धजने के सारे उपकरण बाजार से ही प्राप्त करती थीं । वे बाजार आते जाते स्थापित मूल्यों की अनदेखी कर नदी,नालों, जंगल, या पर्वतों की सुरम्य उपत्यकाओं में थोड़ा बहुत प्रेमरस का पान कर लेने की छूट भी ले लिया करती थीं । इस प्रेमरस में दैहिक सुख का भी समावेश समय, काल, परिस्थिति के अनुसार हो जाया करता था । उनके लिये तो बाजार जाना मानो स्वप्नलोक की यात्रा से किसी भी प्रकार से कम नहीं होता था । कभी कभी तो लोग खुशी खुशी पंदरह, बीस किलोमीटर चलकर आते थे । बाजार के साथ हमेशा से एक बात बड़ी अच्छी है , यह अपने पास आने वाले को कभी निराश या दुखी नहीं करता । क्रेता, विक्रेता, दर्शक, आयोजक, पास पड़ोस, सरकार , मजदूर, किसान , अमीर, गरीब , देशी विदेशी सभी खुश ।
बाजार की संभावनायें अनन्त हैं । यह जिस तेज गति से विस्तृत होते आज दिखती है , उससे तो इसे धरती में अपनी चतुर्दिक उपस्थिति दर्ज कराने में न जाने कितना समय लग जाये । यह अलग बात है कि बाजार के लिये किसी बंधे हुये समय के भीतर एक पूर्वनिश्चित लक्ष को उपलब्ध करना आवश्यक नहीं है । बाजार का सर्वभक्षी उदर अभी बहुत खाली है । उसे उदर भरण की क्रिया तो जारी रखनी ही है । कोई क्या सोचता है , क्या मानता है और क्यों ! उसे कोई मतलब नहीं है । बाजार में मानवीय संवेदना की कल्पना करना भी हास्यास्पद है ।
जैसे जैसे बाजार व्यवस्थित एवं संगठित होता जा रहा है , इसकी आक्रामकता में भी बृद्धि होती जा रही है । कमोवेश इसने सभी क्षेत्रों में , सभी आयु वर्ग को छुआ है । इसकी भंगिमा तो अखिल ब्रम्हाण्ड के समस्त चेतन प्राणियों को अपने आकर्षण के जाल में उलझा लेने का दिखता है । इसने पहले तो धरती की भोली भाली युवा होती कुमारिकाओं में से कुछ को चुनकर उनके मन को कुछ इस तरह से प्रोग्रामिंग किया कि वे स्वयं को उर्वशी और मेनका समझने लगीं । उनके सिरों पर विश्व सुन्दरी, ब्रम्हाण्ड सुन्दरी का ताज भी रखा, और उनको सम्मोहन बिखेरते हुए लोगों को बाजार के आकर्षण में बाँधने का काम सौंप दिया । समाज का हर सफल व्यक्ति चाहे वह नायक हो कि खलनायक, नेता हो कि अभिनेता, बाजार जाने के लिये प्रेरित करता दिखता है । इतना आकर्षण, इतना आत्मीय आमंत्रण चारों दिशाओं से आ रहा है, इतनी रंगीनियाँ, इतना चमक, दमक आसपास चारों ओर विखरा पड़ा है कि कोई कैसे खुद को रोके।
बाजार मानव की इच्छापूर्ति में मरखप रहा है । इसने ऐशोआराम के तमाम साधन उपलब्ध करा दिये हैं । बस मानव को स्वयं को बाजार के अनुकूल ढालने भर की देर है, और फिर वह दिन दूर नहीं कि मानव की पलकें भर इशारा करेंगी और उसकी इच्छापूर्ति हो जाया करेगी ।
बाजार के यौवन के साथ साथ वर्जनाओं के टूटने का सिलसिला चल पड़ा है । सबसे पहले तो इसने सौंदर्य की परिभाषा बदल दी । नारी में लज्जा और सुंदरता का जो पुरातन सम्बन्ध था समाप्त होता दिखता है । शरीर प्रदर्शन अब कला का विषयवस्तु हो गया है । फिर इसने तोड़ा परिवार संस्था को । घर तोड़कर भोजन और आराम प्राप्त करने का साधन मात्र बनाने में इसे ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ा । हाँ यह जरुर है कि भगवान, गाड,खुदा के अस्तित्व पर शंका तो इसने पैदा कर ही दिया है, पर विश्वास ,आस्था खतम करने में इसे अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ रही है । हो सकता है आने वाले दिनों में बाजार ईश्वर का पर्याय बन जाये । यह होनी है इसे कौन टाल सकता है ।
साँस्कृतिक तोड़फोड़ की कारस्तानियाँ अभी महानगरों तक ही सीमित है । मझोले और छोटे शहर तथा गाँवों में माहौल बिगड़ने के लिये तैयार हो चुका है । पब , बार , एमएमएस, डाँस, आदि की जानकारी से कोइ भी अछूता नहीं रह पाया है । इलेक्ट्रानिक मिडिया, समाचार पत्रों आदि से चाहे या अनचाहे इसका फैलाव लगातार जारी है । देखें गाँवों तक बाजार की पहुँच कब होती है ।
बाजार के पाँव पसारने के पहले भी ईश्वर के अस्तित्व के प्रति शंकाएं थीं । रुढियों , अंधविश्वासों से मुक्त होना सभी चाहते थे । ऐशोआराम के साधनों के प्रति सबके मन में ललक थी । स्वच्छंद होना , नियमों की अवहेलना करना, कमोवेश सभी चाहते थे । परन्तु चाहना एक चीज है और होना एकदम दूसरी । प्रत्येक इच्छा पूर्ण हो यह जरुरी तो नहीं । अब जब चाही हुई बातों को बाजार वास्तविकता का धरातल प्रदान कर रहा है तो फिर भय कैसा । बाजार का भी तो हम उसी प्रकार का विरोध कर रहे हैं, कि हमारा विरोध भी रहे और बाजार भी रहे ।
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सोमवार, 28 सितंबर 2009
जीओ और जीने दो
मानव अधिकारों में जीवन का अधिकार मेरे विचार से प्राथमिक अधिकार है । यदि मानव जीवित रहेगा तभी अपने अन्य अधिकारों का उपभोग कर सकेगा । मुर्दे के अधिकार में तो केवल नष्ट होना ही होता है । देश में सुरक्षा का माहौल जो आज दिखाई देता है और जन साधारण का आत्मरक्षा के मामले में जो रवैया है, मुझे नहीं लगता कि आज कोई भी सुरक्षित है । हमने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारी सुरक्षा तंत्र के हाथों में सौंप दी है और हमारे पास एक ही काम है, सुरक्षा तंत्र की असफलता की आलोचना करना । बड़े ही आश्चर्य का विषय है कि हम एक ओर तो सुरक्षा तंत्र को अकर्मण्य, निकम्मा, लापरवाह, और भ्रष्ट मानते हैं और चाहते हैं कि उन्ही की बदौलत हम सुरक्षित भी रहें । यह असंभव सी बात नहीं है क्या?
सुरक्षा तंत्र पर हमारी नाराजगी के कई कारण हैं । हम समझते हैं किः
१, वे घटना या दुर्घटना घटित होने के बाद, बुलाने पर आते हैं, वह भी ज्यादातर बिलम्ब से ।
२, वे अपराधी को ज्यादातर मामलों में पकड़ नहीँ पाते ।
३, उनका अपराधियों से साँठगाँठ रहता है ।
४, ज्यादातर भ्रष्ट होते हैं, बिना लिये दिये काम करना नहीँ चाहते ।
५, उनका व्यवहार अपमानजनक होता है ।
६, वे अपराध होते समय यदि मौके पर होते हैं तो ज्यादातर अनदेखा कर देते हैं या वहाँ से दूर हट जाते हैं ।
७, सज्जन और निर्दोष व्यक्ति अक्सर प्रताड़ित किये जाते हैं ।
इसके अलावा और भी कारण हो सकते हैँ।
चूँकि विषय हमारे जीवन से जुड़ा है, अतः गंभीर चिन्तन की माँग करता है । हमारे जीवन के अधिकार को चुनौती देने वाले सभी कारकों की हमें पहचान करनी होगी और उन कारकों को नष्ट करने के सभी उपाय करने होंगे । ये उपाय व्यक्तिगत, सामाजिक, प्रशासनिक और वैश्विक स्तर के हो सकते हैं ।
व्यक्तिगत उपायों में स्वयं की सुरक्षा के प्रति सजग होना तथा अन्य किसी व्यक्ति के असुरक्षा का कारण नहीं बनना होना चाहिये ।
सामाजिक उपायों में समाज में सुरक्षा के प्रति जागरुकता का वातावरण बनाना होगा । समाज के अंग के रुप में हम सबका यह दायित्व है कि जब, जहाँ, जैसा मौका हो हम अपना तथा अपने आसपास के लोगों की सुरक्षा हेतु प्रयत्न करें । हमारी जागरुकता एवं एकजुटता हमारी बचाव करेगी ।
प्रशासनिक उपायों में सुरक्षा तंत्र पर निर्भरता कम करना तथा आपसी सहयोग बढाना होना चाहिये । सुरक्षाकर्मी भी समाज के अंग हैं । समाज में व्याप्त बुराईयाँ स्वाभाविक रुप से उनमें भी हैं। मानव की जो सीमाऐं हैं उसके अंदर ही वे भी सीमित हैं अतः उनकी सफलता, असफलता भी सामाजिक अच्छाई या बुराई के अनुरुप ही होगी । उन्हें अपने से अलग मानकर उनकी आलोचना करना उनके मनोबल को प्रभावित करेगा जो हम सभी के हित में नहीं है ।
वैश्विक उपायों में राज्य की भागीदारी होती है, जिसे प्रभावित करना वैचारिक क्रांति के रुप में ही संभव है ।
सार यह है कि जीवन का अधिकार मानव मात्र का अधिकार है । इस तथ्य को सभी को स्वीकरना होगा तथा तदनुरुप आचरण भी करना होगा ।
गुरुवार, 4 जून 2009
सावधान प्रदूषण अपनी विकरालता में दिनोदिन बढ़ोत्तरी करता चला जा रहा है
ये सब समस्याऐं हमारी अपनी पैदा की हुई हैं । हम भले ही इसका दोष किसी और पर मढ़कर आत्म संतोष की मृगमरीचिका में अपने को बहला लें, पर सत्य तो यही है कि अपने जीवन को कठिन से कठिनतर बनाने के लिये हम ही जिम्मेदार हैं । हाँ , यह अवश्य है कि नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियाँ आदि सार्वजनिक हित साधन करने वाली संस्थाऐं भी अपनी अकर्मण्यता के साथ इस स्थिति को पैदा करने में हमारा भरपूर सहयोग करती रही हैं ।
हम नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियों को इस अव्यवस्था के लिये जिम्मेदार ठहराकर दो चार गालियाँ देकर अपने कर्तव्य की इति श्री मान लेते है। ज्यादा हुआ तो संबंधित अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करा देते हैं अथवा दस पच्चीस रुपया खर्च करके कभी कभार आस पास साफ सफाई करवा लेते हैं । इससे समस्या का समाधान नहीं हो जाता ।
प्रदूषण , गंदगी का यह भयावह मंजर रुकने का नाम नहीं लेगा जबतक कि इसके बिरुद्ध नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियों के साथ साथ हम और आप एकजुट होकर अभियान न छेड़ दें । आज जरुरत है कि हम आत्म अनुशासन का पाठ फिर से पढ़ें तथा अपने परिवार के सभी सदस्यों को भी साथ लेकर उपरोक्त समस्याओं के पैदा होने वाले कारकों पर कुठाराघात करें, ताकि इन्हें पैदा होने और पनपने का मौका ही न मिले ।
सार यह है कि समस्याओं के निराकरण के लिये हमारा पहल अपेक्षित है । कष्ट हमें है और कष्ट के निदान का उपाय भी हमारे पास है । क्यों न आप और हम नैदानिक उपायों को अमल में लाने की शुरुआत आज ही से करें ।
मंगलवार, 2 जून 2009
समय प्रबंधन
अपने देश की दशा ठीक इसके विपरीत है । जो जितना ही बड़ा होता है वह उतनी ही देरी करता है, जैसे कि इन्तजार कराने से उसकी महत्ता में बढ़ोत्तरी होती हो । नेताजी स्वयं आमसभा आयोजित कराते हैं और अकसर स्वयं देर से पहुँचते हैं । अधिकारी देर से आफिस आते हैं । आफिस समय के बाद देर तक बैठते हैं । कर्मचारी , मजदूर काम पर देर से पहुँचते हैं परन्तु छुट्टी समय पर कर लेते हैं । कुल मिलाकर हर क्षेत्र में देर करने का चलन है ।
देरी से उपजी वेदना का नजारा देखना हो तो उन अभियुक्तों को देखिये को न्याय प्रक्रिया में देरी के कारण बरसों जेल में अनावश्यक कष्ट भोगते रहते हैं ,बाद में बेदाग बरी हो जाते हैं ।
किसी एक्सीडेन्ट में चोट खाये इन्सान को देखिये जो सहायता में देरी या इलाज में बिलम्ब के कारण या तो अपंग हो जाता है या प्राण छोड़ देता है ।
प्राकृतिक आपदा की घड़ी में या दंगा फसाद के समय सरकारी मशीनरी के देरी करने के कारण कितनों को ही अपने जीवन से हाथ धोना पड़ जाता है ।
सरकार की बड़ी बड़ी जनकल्याणकारी योजनाऐं देरी के चलते या तो अपना उद्देश्य खो बैठती हैं या फिर क्रियान्वयन लागत में इतनी बढ़ोत्तरी हो जाती है कि उसे छोड़ना तक पड़ जाता है और एक बड़ी राशि व्यर्थ हो जाती है ।
सार यह है कि विलम्ब के कारण हमें कुछ वर्षों से लेकर जीवन भर की वेदना सहनी पड़ सकती है तथा कभी कभी व्यापक जन धन की हानि भी उठानी पड़ सकती है । अतः , आइये आप और हम समय पाबन्दी की शुरुआत करें ।
शनिवार, 30 मई 2009
सिविक सेंस
यहाँ तक तो ठीक है , परन्तु सडक घेरकर खडे हो जाना तथा आपसी चर्चा में इतना खोये रहना कि इक्का दुक्का गुजरती गाडियों के हार्न बजाने पर भी न हटना, याकि जानबूझकर आती जाती गाडियों की अवहेलना करना, सिविक सेंस के खिलाफ जाता है । इससे दुर्घटनाओं की आशंका तो बनी ही रहती है ।
सार यह है कि सडकों पर आप किसी भी प्रकार से अवरोध न बनें । इससे जान और माल दोनो की हानि की संभावना बनी रहती है ।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
कुज दोष या मंगली दोष
सौर मंडल में ग्रहों के अनुक्रम में बृहस्पति के बाद मंगल का स्थान आता है । वह पृथ्वी से टूटकर अलग हो जाने के कारम आकार में छोटा है तथा कुज कहलाता है । इसका वर्ण अग्नि के समान चमकीला है । रंग लाल है । यह 686 दिन तथा 20 घंटों में राशि चक्र की एक परिक्रमा करता है । मंगल को पुरूष ग्रह माना गया है । यह युध्द का कारक है अत: इसका वर्ण क्षत्रीय है। दक्षिण दिशा मंगल की दिशा है क्योंकि यमराज के समान यह ग्रह भी जीव हानि कराता है । यह पाप ग्रह है । पाप फल देता है । मंगल सेनापति है । पुराणो में देवताओं के सेनापति शिवपुत्र कार्तिकेय माने जाते हैं अत: मंगल के देवता कार्तिकेय हैं ।
ज्योतिष विषयक ग्रंथ बृहत् ज्योतिषसार के ग्रंथकार ने मंगली दोष को परिभाषित करते हुए कहा है :
“लग्ने व्यये च पाताले चाष्टमे कुजे ।
पiत्न हन्ति स्वभर्तारं भतुर्भार्य न जीचित।।
एवं बिधे कुजे संख्ये विवाहो न कदाचन् ।
कार्यो वा गुणबाहुल्ये कुजे वा तादृशे दयो:”।।
यदि लडकी के जन्म लग्न में य बारहवें ्र सातवें ्र चौथे तथा आठवें मंगल हो तो पति का विनाश करे । इसी तरह यदि पति के जन्मलग्न आदि में मंगल हो तो स्त्री का विनाश करे अथार्त इन स्थानें में यदि मंगल हो तो कभी विवाह न करें अथवा बहुत गुण मिलें तो ही विवाह करे । दोनो मंगली हों तो भी विवाह शुभ होता है ।
उपरोक्त श्लेक व्दय में वर्णित मंगल की स्थिति का ्र शक्ति का हम विश्लेषण करें तो हमे निम्नानुसार परिणाम प्राप्त होते हैं :
मंगल अग्नि तत्व है । इसकी अशुभ स्थिति तथा अशुभ दृष्टि हिंसक और मारणात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है । यह सत्य है ।
न्ौसर्गिक रूप से मंगल मेष और बृश्चिक राशि का स्वामी है तथा मेष के 12 अंश तक इसका मूल त्रिकोण है । मंगल अपने स्थान से चतुर्थ सप्तम और अष्टम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है । मकर राशि में यह बलवान माना गया है । मकर उसकी उच्च राशि है और कर्क नीच राशि ।
जन्म लग्न में स्थित होकर मंगल की चतुर्थ दृष्टि गृहस्थी सुख को बहुत बिगाडती है । सप्तम दृष्टि वैवाहिक सुख और दाम्पत्य जीवन को नष्ट करती है । अष्टम भाव ्र जोकि सप्तम से iव्दतीय होने के कारण पति पiत्न दोनो के लिये मरक स्थान होता है ्र पर मंगल की अशुभ दृष्टि यमराज के कार्य को अंजाम देती है ।
जन्म लग्न से चतुर्थ भाव पर मंगल स्थित होकर सप्तम के साथ साथ कर्म के भाव दशम तथा आय भाव एकादश पर भी दृष्टि निक्षेप करता है । ज्योतिष के अधिकांश ग्रंथकार तथा पंडित इस बात पर एकमत हैं कि जिस जन्म कुंडली में च्तुर्थ भाव पर मंगल विराजमान होते हैं ्रअन्य समस्त ग्रहों का सामथ्र्य ़ उनकी शुभफल दातृव्य शक्ति सभी कुछ व्यर्थ हो जाता है और ंमंगल का केवल नाशकारी प्रभाव सर्वोपरी होता है ।
सप्तमस्त मंगल जातक को प्रबल मांगलिक बनाता है । यह स्थिति पति पiत्न दोनो के लिये अशुभ मानी गई है । ऐसे मंगल को “कांताघाती” नाम से अभिहित किया गया है ! सप्तमस्थ मंगल दशम भाव के साथ साथ लग्न तथा मरक भाव iव्दतीय पर पूर्ण दृष्टिपात करता है । यह स्थिति विनाश ़ विनाश और केवल विनाश का हेतु है ।
आठवें भाव पर मंगल की स्थिति सप्तम से iव्दतीय होने के कारण जातक के सहचर : पति या पiत्न : के लिये प्रबल मारकेश की होती है । अष्टम से मंगल की एकादश ़ iव्दतीय ़और तृतीय भाव पर पूर्ण दृष्टि रहती है । ऐसा जातक अल्पायु ़ धनहीन ़तथा निन्दा का पात्र होता है ।
मंगल की व्दादश भाव पर स्थिति जातक को अदार :पiत्न रहित : तथा अधम बनाता है । ऐसा मंगल iव्दतीय भाव के साथ षष्ठ और सप्तम पर पूर्ण दृष्टिपात करता है और जातक के लिये अपयशकारक ़ स्वास्थ्यहीन तथा सहचर के विनाश का कारण बन जाता है ।
भावदीपिका ग्रंथ के ग्रंथकार ने मंगल के iव्दतीय भाव की स्थिति को भी मंगलीदोष में गिना है । दूसरा भाव कुटुम्ब स्थान कहलाता है । इस भाव में बैठकर मंगल जातक को परिवारहीन बनाता है । iव्दतीयस्थ मंगल की दृष्टि पंचम ़अष्टम एवं नवम भाव पर पडती है । पंचम पुत्रभाव ़ अष्टम सहचर का मारक भाव ़तथा नवम भाग्य भाव है । iव्दतीय भाव का मंगल जातक को पुत्रहीन ़ अदार तथा भाग्यहीन बना देता है ।
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि मंगली दोष जातक के सहचर के लिये प्राणघातक होने के साथ साथ उसे भाग्यहीन ़ सुखपभोग से वंचित ़ अपयश का भागी ़ पुत्रहीन तथा रोगी आदि कई प्रकार से संतप्त करता है ।अत: उसके विषय में व्याप्त भय उचित ही लगता है ।
यदि हम मान भी लें कि मंगलीदोष की अशुभता को महत्व प्रदान करना आवश्यक है ़ तो कुछ एक योग ़अपवाद ऐसे भी हैं जिनमें मंगल की उपयुर्क्त स्थिति से अशुभता नहीं होती । ये योग निम्न हैं :
1़ यदि स्त्री और पुरूष दोनो की कुण्डलियों में मंगली दोष हो तो किसी अशुभ परिणाम की संभावना नहीं होती ।
2 ़यदि मंगल तुला या बृष राशि में चाहे किसी भी भाव में हो तो मंगलीदोष नहीं माना जाता ।
3 ़यदि मंगल iव्दतीय भाव में मिथुन या कन्या राशि में हो तो मंगली दोष नहीं होता क्येांकि मिथुन में बैठकर मंगल की दृष्टि अपने घर पर होगी । अपने घर को कोई नष्ट नहीं करता । दूसरे कन्या में iव्दतीय भाव में होने से मंगल चतुर्थ और नवम का स्वामी होकर योगकारक हो जाता है । अत्यंत शुभग्रह बन जाता है ।
4 ़ व्दादश भाव में यदि मंगल बृष या तुला राशि में होता है तो भी मंगली दोष नहीं माना जाता ़ क्योंकि बृष में होकर मंगल षष्ठ भाव की वृश्चिक राशि पर दृष्टिपात करेगा जो उसकी स्वराशि है । तुला का मंगल लग्नेश होने के कारण मंगल से अशुभ फल की आशा नहीं करनी चाहिये ।
5 ़ चतुर्थ भाव में मंगली दोष हो सकता है यदि मेष और बृश्चिक ़जे उसकी स्वराशियॅां हैं के अतिरिक्त कोई दूसरी राशि हो ।
6 ़ सप्तम में स्थित मंगल दोषपूर्ण होगा यदि उस भाव में मकर या कर्क राशि न हो ।
7 ़ यदि अष्टम में धनु या मीन राशि है तो भी मंगल का दोष नहीं व्यापता । इस स्थिति में मंगल योगकारक होकर अत्यंत शुभ ग्रह बन जाता है ।
8 ़ “ जामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेतथा
नवमें व्दादशे चैव भौम दोषो न विद्यते”
लग्न ़ सप्तम ़चतुर्थ ़ नवम तथा बारहवें भाव में यदि शनिश्चर स्थित हों तो मंगली दोष नहीं होता ।
9 ़ पुरूय और स्त्री कुंडलियों में मंगल दोष की शक्ति से करना चाहिये ।
10 ़ मंगलदोष का कुप्रभाव शास्त्रानुसार उसकी शॉंति के उपाय करने से जाता रहता है ।
मंगलदोष की बिना उचित और आवश्यक जॉंच पडताल किये ़ मंगल के बलाबल को बिना परखे भयभीत होने का कोई कारण नहीं है ।