कहीं पढ़ा था कि जापानी लोगों के शब्दकोश में लेट|बिलम्ब शब्द नहीं है । समय की पाबंदी उनका सहज स्वभाव है। समय पर सारे कार्य करना उनकी परम्परा है । यदि कोई कहीं देरी से पहुँचता है तो उसे लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। ज्यादा देरी तो उसका काम ही बिगाड़ देती है ।
अपने देश की दशा ठीक इसके विपरीत है । जो जितना ही बड़ा होता है वह उतनी ही देरी करता है, जैसे कि इन्तजार कराने से उसकी महत्ता में बढ़ोत्तरी होती हो । नेताजी स्वयं आमसभा आयोजित कराते हैं और अकसर स्वयं देर से पहुँचते हैं । अधिकारी देर से आफिस आते हैं । आफिस समय के बाद देर तक बैठते हैं । कर्मचारी , मजदूर काम पर देर से पहुँचते हैं परन्तु छुट्टी समय पर कर लेते हैं । कुल मिलाकर हर क्षेत्र में देर करने का चलन है ।
देरी से उपजी वेदना का नजारा देखना हो तो उन अभियुक्तों को देखिये को न्याय प्रक्रिया में देरी के कारण बरसों जेल में अनावश्यक कष्ट भोगते रहते हैं ,बाद में बेदाग बरी हो जाते हैं ।
किसी एक्सीडेन्ट में चोट खाये इन्सान को देखिये जो सहायता में देरी या इलाज में बिलम्ब के कारण या तो अपंग हो जाता है या प्राण छोड़ देता है ।
प्राकृतिक आपदा की घड़ी में या दंगा फसाद के समय सरकारी मशीनरी के देरी करने के कारण कितनों को ही अपने जीवन से हाथ धोना पड़ जाता है ।
सरकार की बड़ी बड़ी जनकल्याणकारी योजनाऐं देरी के चलते या तो अपना उद्देश्य खो बैठती हैं या फिर क्रियान्वयन लागत में इतनी बढ़ोत्तरी हो जाती है कि उसे छोड़ना तक पड़ जाता है और एक बड़ी राशि व्यर्थ हो जाती है ।
सार यह है कि विलम्ब के कारण हमें कुछ वर्षों से लेकर जीवन भर की वेदना सहनी पड़ सकती है तथा कभी कभी व्यापक जन धन की हानि भी उठानी पड़ सकती है । अतः , आइये आप और हम समय पाबन्दी की शुरुआत करें ।
मंगलवार, 2 जून 2009
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