वह एक गहरी नींद से जगा था । नींद भी कोई ऐसी वैसी नहीं थी । बेहोशी या समाधि । दोनों या कोई नहीं । वह कब सोया था ? कितने अंतराल के बाद जागा ?, उसे नहीं पता । समय काल, जिसकी गोद में यह सारा आडम्बर का अस्तित्व फलता फूलता , खेलता कूदता है, स्वयं में अस्तित्वहीन हो गया था । वह तो यह भी नहीं जानता कि इस लम्बी निद्रा को सोनेवाला कौन था । ऐसे जैसे निद्रा स्वयं सो रही थी । सोना भी सत्य था , जागना भी सत्य है । द्वैत, अद्वैत, एक, अनेक, लघु , बृहत, उत्तम , मध्यम , अन्य , इनमें से किसी में भी वह अपने आप को नहीं पाया । पहले सुसुप्ति थी अब चैतन्यता है , बस ।
अब जबकि वह जाग गया है , अपने आप को पहचानने में असमर्थ है । उसकी पहचान ही खो गई है ।यह जागरण भी क्या ? जागरण और निद्रा का प्रभेद करना कठिन है । अपने होने को , अस्तित्व की अनुभूति को वह जागरण मान रहा है । उस गहन निद्रा में उसने बहुत कुछ खोया है। पहले तो उससे उसकी इयत्ता खो गई । नाम, रुप, स्थूल या सूक्ष्म कुछ भी तो नहीं है । उसका लिंग क्या है । वह नर है कि मादा । उसकी किस जाति का है । गोरा है कि काला । उसकी भाषा कौन सी है । वह लम्बा है कि ठिगना । पहचान के सारे ही कारक बिलुप्त हैं । वह है और नहीं है के बीच झूल रहा है । उसकी स्मृति भी तो कोरे कागज की तरह शून्य हो गई है । स्मृति के खोने से उसका और काल का सम्पर्क ही मानो टूट गया है । स्मृति का आधार भी तो काल ही है । काल के अनस्तित्व हो जाने की स्थिति में स्मृति की संभावना स्वयमेव शून्य हो जाती है । पिछला या अगला कुछ भी तो नहीं है उसके पास । शून्य , शून्य , महाशून्य ।
उसकी चैतन्यता जैसे जैसे बढ़ती गई, उसका अभाव भी बढ़ता गया । उसने अपने आप को एक नितान्त ही अचीन्हे , अनजान जगह पर पाया । उसे समझ में ही नहीं आया कि इसे क्या कहें ? यदि वह धरती पर है तो यह कौन सी जगह है ? उसकी अवस्थिति ब्रम्हाण्ड में कहाँ है ? आकाशगंगा के किस छोर पर ? उसके लिये निश्चय कर पाना कठिन हो गया । यहाँ तो न रंग है ,न रुप है, न आकार है न विस्तार है, न आधार ही है । सभी दिशाओं में केवल एक शून्य । फिर दिशाऐं भी कहाँ हैं ? कहीं वह कुछ होने, न होने के उस पार तो नहीं पहुँच गया है ,जहाँ कुछ न होकर भी बहुत कुछ होता है ।
उसे अकुलाहट होने लगी । एक अजब व्याकुलता ने उसे घेर लिया । वह समझ ही नहीं पा रहा था कि वह चाहता क्या है । चाहने की बात सामने आते ही उसे पता चल गया कि उसके पास तो अपना शरीर भी नहीं है । शरीर........। नहीं है । पर वह है । यह कैसी माया ? वह चमत्कृत हो गया । क्या ऐसा भी संभव है कि शरीर न हो पर वह हो । फिर "मैं हुँ कौन" ? और इस प्रश्न में जैसे वह पूरा का पूरा समा गया । उसका अंगहीन अस्तित्व ही प्रश्न में बदल गया । उसके भीतर, उसके बाहर, अबतक जो एक महाशून्य था, । वह "मैं कौन हूँ?" प्रश्न बन गया ।
अचानक ही उसे द्वैत स्थिति का भान हुआ । उसका आकर्षण हुआ और वह धरती पर आ गया । उसे धरती पहचानी सी लगी । अब वह जाना कि वह धरती पर न होकर कहीं और था । पर कहाँ ? पहले तो एक ही प्रश्न था "मैं कौन हूँ?" । अब और प्रश्न जुड़ गये थे । वह कहाँ था? । वहाँ कब से था? । वहाँ क्यों था? । उत्तर विहिन अन्तहीन प्रश्नों की श्रृखला । उसे कई युगनद्ध जोडे दिखे । केली कौतुहल में रत स्वश्थ नर मादा । सृजन का उपक्रम । नवीन संरचना। कोमल । नव पल्लव । विकास का यशोगान । सब कुछ संमोहक । वह स्वयं को उनके पास से गुजरता पाया । जोडों के पास आते आते उसका उच्चाटन हो जाता और वह आगे बढ़ जाता । एक प्रवहमान धारा की तरह क्रमानुसार । पता नहीं यह कार्य व्यापार कितने काल पर्यंत चलता रहा । अनायास ही एक जोड़े में उसका आकर्षण हुआ और विना किसी व्यवधान के वह उनमें समा गया । अब वह पायेगा नया कलेवर । सर्व सक्षम । क्रिया, कर्म, कतृत्व शक्ति के साथ । यही तो है ब्रम्हानन्द की परम अनुभूति । और फिर, एक और लम्बी गहन निद्रा...............................।
शनिवार, 2 जनवरी 2010
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