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सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्रोत्सवः एक मंत्र कविता

इस गणतन्त्र में
गण के तन्त्र को नमस्कार है

तन्त्र की शक्ति
गण की भक्ति
विकास की तख्ती में
चढ़े हुए रंगों को नमस्कार है

इस व्यवस्था, तन्त्र में
लोकसभा में
उखाड़े गये माईक और
कुर्सियों को नमस्कार है
विधानसभा पटल पर
रखे गये रिश्वत के नोटों को नमस्कार है

हर पाँच साल में
वोटरों द्वारा पी गई दारू,
कम्बल और साड़ियाँ,
नोट और वोट दोनों को नमस्कार है

जनता की सेवा के नाम पर
एसी लगे बैठकों को,
विदेश की यात्राओं को,
नक्सलियों से साँठगाँठ को,
कभी न पूरी होने वाली घोषणाओं को,
अमर्यादित आचरण को,
पाले हुए बाहुबलियों को नमस्कार है

जनता का,
जनता के लिये,
जनता के द्वारा
नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है
०००००००००००००

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

तुम्हारा नाम

फिर बिछलती साँझ ने
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।

बहककर है आ गया
मेरे दुआरे
अन्य बागों से मधुर मलयी पवन
बिछ रहे पथ में
अतुल विश्वास लेकर
किस अदेखे ताल से ये
भीगकर आये नयन ।

हर सुलगते शब्द ने
आकर किया है
फिर मुझे बदनाम ।


फिर बिछलती साँझ ने
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।

दूर शाखों में बसी
वह गंध
भरमाती रही है
बंद पलकों में
तुम्हारी याद
तरसाती रही है
इक सुखद अहसास है
सालता
मुझको अजाना
अधजनी अनुभूतियों में
आस
ललसाती रही है ।

अ नियंत्रित
पग कसकते
चाहते विश्राम ।

फिर बिछलती साँझ ने
भरमा दिया
लेकर तुम्हारा नाम ।
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