दोपहर के समय सडकों पर ट्रेफिक का दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है । कालोनियों के बीच की सडकें तो प्राय खाली ही होती हैं । इसी समय गृह स्वामिनियाँ भी अपने पति और बच्चों को आफिस और स्कूल|कालेज के लिये बिदा कर फुरसत से होती हैं , अतः पास पडोस की दो चार सहेलियाँ किसी एक के दरवाजे पर इकट्ठा होकर बतियाने लगती हैं । ऐसा बेतकल्लूफ बतियाना आपसी समझ को बढ़ानेवाला तथा दो पडोसियोँ के बीच स्नेह,प्रेम को गहरा करने में सहयोगी साबित होता है ।
यहाँ तक तो ठीक है , परन्तु सडक घेरकर खडे हो जाना तथा आपसी चर्चा में इतना खोये रहना कि इक्का दुक्का गुजरती गाडियों के हार्न बजाने पर भी न हटना, याकि जानबूझकर आती जाती गाडियों की अवहेलना करना, सिविक सेंस के खिलाफ जाता है । इससे दुर्घटनाओं की आशंका तो बनी ही रहती है ।
सार यह है कि सडकों पर आप किसी भी प्रकार से अवरोध न बनें । इससे जान और माल दोनो की हानि की संभावना बनी रहती है ।
शनिवार, 30 मई 2009
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bat to sahi hai janab.narayan narayan
जवाब देंहटाएंhari om
जवाब देंहटाएंमनुष्य के अस्तित्व की तलाश का अनोखा तरीका..सिविक सेंस के साथ..
जवाब देंहटाएंपसंद आया..
किसी ना किसी रोड़ पर मिल ही जाएगा शायद, जहां कि मनुष्य नाम का प्राणी पैर भी नहीं फटक पाये.
अच्छा मुद्दा उठाया है आपने
जवाब देंहटाएंशुभकामनाएं...
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