सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्रोत्सवः एक मंत्र कविता

इस गणतन्त्र में
गण के तन्त्र को नमस्कार है

तन्त्र की शक्ति
गण की भक्ति
विकास की तख्ती में
चढ़े हुए रंगों को नमस्कार है

इस व्यवस्था, तन्त्र में
लोकसभा में
उखाड़े गये माईक और
कुर्सियों को नमस्कार है
विधानसभा पटल पर
रखे गये रिश्वत के नोटों को नमस्कार है

हर पाँच साल में
वोटरों द्वारा पी गई दारू,
कम्बल और साड़ियाँ,
नोट और वोट दोनों को नमस्कार है

जनता की सेवा के नाम पर
एसी लगे बैठकों को,
विदेश की यात्राओं को,
नक्सलियों से साँठगाँठ को,
कभी न पूरी होने वाली घोषणाओं को,
अमर्यादित आचरण को,
पाले हुए बाहुबलियों को नमस्कार है

जनता का,
जनता के लिये,
जनता के द्वारा
नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है
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