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सोमवार, 28 सितंबर 2009

जीओ और जीने दो


मानव अधिकारों में जीवन का अधिकार मेरे विचार से प्राथमिक अधिकार है । यदि मानव जीवित रहेगा तभी अपने अन्य अधिकारों का उपभोग कर सकेगा । मुर्दे के अधिकार में तो केवल नष्ट होना ही होता है । देश में सुरक्षा का माहौल जो आज दिखाई देता है और जन साधारण का आत्मरक्षा के मामले में जो रवैया है, मुझे नहीं लगता कि आज कोई भी सुरक्षित है । हमने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारी सुरक्षा तंत्र के हाथों में सौंप दी है और हमारे पास एक ही काम है, सुरक्षा तंत्र की असफलता की आलोचना करना । बड़े ही आश्चर्य का विषय है कि हम एक ओर तो सुरक्षा तंत्र को अकर्मण्य, निकम्मा, लापरवाह, और भ्रष्ट मानते हैं और चाहते हैं कि उन्ही की बदौलत हम सुरक्षित भी रहें । यह असंभव सी बात नहीं है क्या?
सुरक्षा तंत्र पर हमारी नाराजगी के कई कारण हैं । हम समझते हैं किः
१, वे घटना या दुर्घटना घटित होने के बाद, बुलाने पर आते हैं, वह भी ज्यादातर बिलम्ब से ।
२, वे अपराधी को ज्यादातर मामलों में पकड़ नहीँ पाते ।
३, उनका अपराधियों से साँठगाँठ रहता है ।
४, ज्यादातर भ्रष्ट होते हैं, बिना लिये दिये काम करना नहीँ चाहते ।
५, उनका व्यवहार अपमानजनक होता है ।
६, वे अपराध होते समय यदि मौके पर होते हैं तो ज्यादातर अनदेखा कर देते हैं या वहाँ से दूर हट जाते हैं ।
७, सज्जन और निर्दोष व्यक्ति अक्सर प्रताड़ित किये जाते हैं ।
इसके अलावा और भी कारण हो सकते हैँ।
चूँकि विषय हमारे जीवन से जुड़ा है, अतः गंभीर चिन्तन की माँग करता है । हमारे जीवन के अधिकार को चुनौती देने वाले सभी कारकों की हमें पहचान करनी होगी और उन कारकों को नष्ट करने के सभी उपाय करने होंगे । ये उपाय व्यक्तिगत, सामाजिक, प्रशासनिक और वैश्विक स्तर के हो सकते हैं ।
व्यक्तिगत उपायों में स्वयं की सुरक्षा के प्रति सजग होना तथा अन्य किसी व्यक्ति के असुरक्षा का कारण नहीं बनना होना चाहिये ।
सामाजिक उपायों में समाज में सुरक्षा के प्रति जागरुकता का वातावरण बनाना होगा । समाज के अंग के रुप में हम सबका यह दायित्व है कि जब, जहाँ, जैसा मौका हो हम अपना तथा अपने आसपास के लोगों की सुरक्षा हेतु प्रयत्न करें । हमारी जागरुकता एवं एकजुटता हमारी बचाव करेगी ।
प्रशासनिक उपायों में सुरक्षा तंत्र पर निर्भरता कम करना तथा आपसी सहयोग बढाना होना चाहिये । सुरक्षाकर्मी भी समाज के अंग हैं । समाज में व्याप्त बुराईयाँ स्वाभाविक रुप से उनमें भी हैं। मानव की जो सीमाऐं हैं उसके अंदर ही वे भी सीमित हैं अतः उनकी सफलता, असफलता भी सामाजिक अच्छाई या बुराई के अनुरुप ही होगी । उन्हें अपने से अलग मानकर उनकी आलोचना करना उनके मनोबल को प्रभावित करेगा जो हम सभी के हित में नहीं है ।
वैश्विक उपायों में राज्य की भागीदारी होती है, जिसे प्रभावित करना वैचारिक क्रांति के रुप में ही संभव है ।
सार यह है कि जीवन का अधिकार मानव मात्र का अधिकार है । इस तथ्य को सभी को स्वीकरना होगा तथा तदनुरुप आचरण भी करना होगा ।