रविवार, 4 अक्टूबर 2009

बाजार से डरना मना है

आज बाजार के साथ वाद शब्द जुड़कर एक बिल्कुल ही नये अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है । बाजारवाद शब्द में जिस दार्शनिक गंभीरता का पुट होना चाहिये , वह नदारत है । मुझे बाजारवाद के पक्ष में खड़ा कोई नहीं दिखता । सब के सब बिपक्ष में हैं । प्रजातन्त्र के इस युग में महर्षि चार्वाक जैसा सत्यवादी , निर्भीक, पक्षधर, का होना बाजारवाद के लिये शुभ होता । ऐसा नहीं है कि चार्वाक जैसा पक्षधर का होना बाजारवाद के लिये कोई शक्तिदायी स्थिति निर्मित करता या नहीं होना उसे किसी भी रुप में कमजोर करता है । होता यह कि बाजारवाद की पहचान के पश्चात जो संभ्रम की स्थिति निर्मित हुई है । वह साफ हो जाती । दृश्य उजला होता तो आज जो बाजारवाद के नाम से भय का संचार होने लगता है, उसमें निश्चय ही कमी आती । भय के कारण तनावग्रस्त हो रहे विवेकवान व्यक्ति भी संयमित होकर बाजार को नजदीक से परखते । उसके गुण दोषों की व्यापक समीक्षा होती । विरोध का आर्तनाद जो आज सुनाई पड़ रहा है उसका सुर बदलता, क्योंकि इस नपुंशक विरोध का कुछ भी तो असर बाजारवाद पर नहीं पड़ रहा । वह तो उस हाथी की तरह झूमता, झामता मंथर गति से आगे बढता चला जा रहा है, जिसे सुरापान करा दिया गया हो और जिसका कोई महावत कभी था ही नहीं । अंकुश से सर्वथा अपरिचित ।
बाजार में आयी यह जवानी जो आज उफान पर दिखती है, यह इसका सर्वथा नया रुप है । बाजार कभी भी इतना व्यापक नहीं था। यह स्वच्छंद भी नहीं था । इसकी सीमा थी । यह सैकड़ों बरस तक समय, काल, स्थान, क्षेत्र आदि से बंधा हुआ था । साप्ताहिक हाट एवं वार्षिक मेला लम्बे समय तक बाजार के रुप में स्थापित रहे हैं । लेकिन यह उस समय भी अपने प्रति ललक पैदा करने में सक्षम हुआ करता था । इसे देखने, छूने, और इसके साथ तादात्म्य स्थापित करने की इच्छा से हर उम्र के लोग बाजार में आते थे । जवानी की दहलीज पर पाँव रखती कुमारियाँ जिनमें अपने सौंदर्य का अहसास बोध कुलबुलाने लगता था, अपने रुप को संवारने, सजने धजने के सारे उपकरण बाजार से ही प्राप्त करती थीं । वे बाजार आते जाते स्थापित मूल्यों की अनदेखी कर नदी,नालों, जंगल, या पर्वतों की सुरम्य उपत्यकाओं में थोड़ा बहुत प्रेमरस का पान कर लेने की छूट भी ले लिया करती थीं । इस प्रेमरस में दैहिक सुख का भी समावेश समय, काल, परिस्थिति के अनुसार हो जाया करता था । उनके लिये तो बाजार जाना मानो स्वप्नलोक की यात्रा से किसी भी प्रकार से कम नहीं होता था । कभी कभी तो लोग खुशी खुशी पंदरह, बीस किलोमीटर चलकर आते थे । बाजार के साथ हमेशा से एक बात बड़ी अच्छी है , यह अपने पास आने वाले को कभी निराश या दुखी नहीं करता । क्रेता, विक्रेता, दर्शक, आयोजक, पास पड़ोस, सरकार , मजदूर, किसान , अमीर, गरीब , देशी विदेशी सभी खुश ।
बाजार की संभावनायें अनन्त हैं । यह जिस तेज गति से विस्तृत होते आज दिखती है , उससे तो इसे धरती में अपनी चतुर्दिक उपस्थिति दर्ज कराने में न जाने कितना समय लग जाये । यह अलग बात है कि बाजार के लिये किसी बंधे हुये समय के भीतर एक पूर्वनिश्चित लक्ष को उपलब्ध करना आवश्यक नहीं है । बाजार का सर्वभक्षी उदर अभी बहुत खाली है । उसे उदर भरण की क्रिया तो जारी रखनी ही है । कोई क्या सोचता है , क्या मानता है और क्यों ! उसे कोई मतलब नहीं है । बाजार में मानवीय संवेदना की कल्पना करना भी हास्यास्पद है ।
जैसे जैसे बाजार व्यवस्थित एवं संगठित होता जा रहा है , इसकी आक्रामकता में भी बृद्धि होती जा रही है । कमोवेश इसने सभी क्षेत्रों में , सभी आयु वर्ग को छुआ है । इसकी भंगिमा तो अखिल ब्रम्हाण्ड के समस्त चेतन प्राणियों को अपने आकर्षण के जाल में उलझा लेने का दिखता है । इसने पहले तो धरती की भोली भाली युवा होती कुमारिकाओं में से कुछ को चुनकर उनके मन को कुछ इस तरह से प्रोग्रामिंग किया कि वे स्वयं को उर्वशी और मेनका समझने लगीं । उनके सिरों पर विश्व सुन्दरी, ब्रम्हाण्ड सुन्दरी का ताज भी रखा, और उनको सम्मोहन बिखेरते हुए लोगों को बाजार के आकर्षण में बाँधने का काम सौंप दिया । समाज का हर सफल व्यक्ति चाहे वह नायक हो कि खलनायक, नेता हो कि अभिनेता, बाजार जाने के लिये प्रेरित करता दिखता है । इतना आकर्षण, इतना आत्मीय आमंत्रण चारों दिशाओं से आ रहा है, इतनी रंगीनियाँ, इतना चमक, दमक आसपास चारों ओर विखरा पड़ा है कि कोई कैसे खुद को रोके।
बाजार मानव की इच्छापूर्ति में मरखप रहा है । इसने ऐशोआराम के तमाम साधन उपलब्ध करा दिये हैं । बस मानव को स्वयं को बाजार के अनुकूल ढालने भर की देर है, और फिर वह दिन दूर नहीं कि मानव की पलकें भर इशारा करेंगी और उसकी इच्छापूर्ति हो जाया करेगी ।
बाजार के यौवन के साथ साथ वर्जनाओं के टूटने का सिलसिला चल पड़ा है । सबसे पहले तो इसने सौंदर्य की परिभाषा बदल दी । नारी में लज्जा और सुंदरता का जो पुरातन सम्बन्ध था समाप्त होता दिखता है । शरीर प्रदर्शन अब कला का विषयवस्तु हो गया है । फिर इसने तोड़ा परिवार संस्था को । घर तोड़कर भोजन और आराम प्राप्त करने का साधन मात्र बनाने में इसे ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ा । हाँ यह जरुर है कि भगवान, गाड,खुदा के अस्तित्व पर शंका तो इसने पैदा कर ही दिया है, पर विश्वास ,आस्था खतम करने में इसे अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ रही है । हो सकता है आने वाले दिनों में बाजार ईश्वर का पर्याय बन जाये । यह होनी है इसे कौन टाल सकता है ।
साँस्कृतिक तोड़फोड़ की कारस्तानियाँ अभी महानगरों तक ही सीमित है । मझोले और छोटे शहर तथा गाँवों में माहौल बिगड़ने के लिये तैयार हो चुका है । पब , बार , एमएमएस, डाँस, आदि की जानकारी से कोइ भी अछूता नहीं रह पाया है । इलेक्ट्रानिक मिडिया, समाचार पत्रों आदि से चाहे या अनचाहे इसका फैलाव लगातार जारी है । देखें गाँवों तक बाजार की पहुँच कब होती है ।
बाजार के पाँव पसारने के पहले भी ईश्वर के अस्तित्व के प्रति शंकाएं थीं । रुढियों , अंधविश्वासों से मुक्त होना सभी चाहते थे । ऐशोआराम के साधनों के प्रति सबके मन में ललक थी । स्वच्छंद होना , नियमों की अवहेलना करना, कमोवेश सभी चाहते थे । परन्तु चाहना एक चीज है और होना एकदम दूसरी । प्रत्येक इच्छा पूर्ण हो यह जरुरी तो नहीं । अब जब चाही हुई बातों को बाजार वास्तविकता का धरातल प्रदान कर रहा है तो फिर भय कैसा । बाजार का भी तो हम उसी प्रकार का विरोध कर रहे हैं, कि हमारा विरोध भी रहे और बाजार भी रहे ।
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