सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्रोत्सवः एक मंत्र कविता

इस गणतन्त्र में
गण के तन्त्र को नमस्कार है

तन्त्र की शक्ति
गण की भक्ति
विकास की तख्ती में
चढ़े हुए रंगों को नमस्कार है

इस व्यवस्था, तन्त्र में
लोकसभा में
उखाड़े गये माईक और
कुर्सियों को नमस्कार है
विधानसभा पटल पर
रखे गये रिश्वत के नोटों को नमस्कार है

हर पाँच साल में
वोटरों द्वारा पी गई दारू,
कम्बल और साड़ियाँ,
नोट और वोट दोनों को नमस्कार है

जनता की सेवा के नाम पर
एसी लगे बैठकों को,
विदेश की यात्राओं को,
नक्सलियों से साँठगाँठ को,
कभी न पूरी होने वाली घोषणाओं को,
अमर्यादित आचरण को,
पाले हुए बाहुबलियों को नमस्कार है

जनता का,
जनता के लिये,
जनता के द्वारा
नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है
०००००००००००००

शनिवार, 2 जनवरी 2010

ललित निबंध : नया कलेवर

वह एक गहरी नींद से जगा था । नींद भी कोई ऐसी वैसी नहीं थी । बेहोशी या समाधि । दोनों या कोई नहीं । वह कब सोया था ? कितने अंतराल के बाद जागा ?, उसे नहीं पता । समय काल, जिसकी गोद में यह सारा आडम्बर का अस्तित्व फलता फूलता , खेलता कूदता है, स्वयं में अस्तित्वहीन हो गया था । वह तो यह भी नहीं जानता कि इस लम्बी निद्रा को सोनेवाला कौन था । ऐसे जैसे निद्रा स्वयं सो रही थी । सोना भी सत्य था , जागना भी सत्य है । द्वैत, अद्वैत, एक, अनेक, लघु , बृहत, उत्तम , मध्यम , अन्य , इनमें से किसी में भी वह अपने आप को नहीं पाया । पहले सुसुप्ति थी अब चैतन्यता है , बस ।
अब जबकि वह जाग गया है , अपने आप को पहचानने में असमर्थ है । उसकी पहचान ही खो गई है ।यह जागरण भी क्या ? जागरण और निद्रा का प्रभेद करना कठिन है । अपने होने को , अस्तित्व की अनुभूति को वह जागरण मान रहा है । उस गहन निद्रा में उसने बहुत कुछ खोया है। पहले तो उससे उसकी इयत्ता खो गई । नाम, रुप, स्थूल या सूक्ष्म कुछ भी तो नहीं है । उसका लिंग क्या है । वह नर है कि मादा । उसकी किस जाति का है । गोरा है कि काला । उसकी भाषा कौन सी है । वह लम्बा है कि ठिगना । पहचान के सारे ही कारक बिलुप्त हैं । वह है और नहीं है के बीच झूल रहा है । उसकी स्मृति भी तो कोरे कागज की तरह शून्य हो गई है । स्मृति के खोने से उसका और काल का सम्पर्क ही मानो टूट गया है । स्मृति का आधार भी तो काल ही है । काल के अनस्तित्व हो जाने की स्थिति में स्मृति की संभावना स्वयमेव शून्य हो जाती है । पिछला या अगला कुछ भी तो नहीं है उसके पास । शून्य , शून्य , महाशून्य ।
उसकी चैतन्यता जैसे जैसे बढ़ती गई, उसका अभाव भी बढ़ता गया । उसने अपने आप को एक नितान्त ही अचीन्हे , अनजान जगह पर पाया । उसे समझ में ही नहीं आया कि इसे क्या कहें ? यदि वह धरती पर है तो यह कौन सी जगह है ? उसकी अवस्थिति ब्रम्हाण्ड में कहाँ है ? आकाशगंगा के किस छोर पर ? उसके लिये निश्चय कर पाना कठिन हो गया । यहाँ तो न रंग है ,न रुप है, न आकार है न विस्तार है, न आधार ही है । सभी दिशाओं में केवल एक शून्य । फिर दिशाऐं भी कहाँ हैं ? कहीं वह कुछ होने, न होने के उस पार तो नहीं पहुँच गया है ,जहाँ कुछ न होकर भी बहुत कुछ होता है ।
उसे अकुलाहट होने लगी । एक अजब व्याकुलता ने उसे घेर लिया । वह समझ ही नहीं पा रहा था कि वह चाहता क्या है । चाहने की बात सामने आते ही उसे पता चल गया कि उसके पास तो अपना शरीर भी नहीं है । शरीर........। नहीं है । पर वह है । यह कैसी माया ? वह चमत्कृत हो गया । क्या ऐसा भी संभव है कि शरीर न हो पर वह हो । फिर "मैं हुँ कौन" ? और इस प्रश्न में जैसे वह पूरा का पूरा समा गया । उसका अंगहीन अस्तित्व ही प्रश्न में बदल गया । उसके भीतर, उसके बाहर, अबतक जो एक महाशून्य था, । वह "मैं कौन हूँ?" प्रश्न बन गया ।
अचानक ही उसे द्वैत स्थिति का भान हुआ । उसका आकर्षण हुआ और वह धरती पर आ गया । उसे धरती पहचानी सी लगी । अब वह जाना कि वह धरती पर न होकर कहीं और था । पर कहाँ ? पहले तो एक ही प्रश्न था "मैं कौन हूँ?" । अब और प्रश्न जुड़ गये थे । वह कहाँ था? । वहाँ कब से था? । वहाँ क्यों था? । उत्तर विहिन अन्तहीन प्रश्नों की श्रृखला । उसे कई युगनद्ध जोडे दिखे । केली कौतुहल में रत स्वश्थ नर मादा । सृजन का उपक्रम । नवीन संरचना। कोमल । नव पल्लव । विकास का यशोगान । सब कुछ संमोहक । वह स्वयं को उनके पास से गुजरता पाया । जोडों के पास आते आते उसका उच्चाटन हो जाता और वह आगे बढ़ जाता । एक प्रवहमान धारा की तरह क्रमानुसार । पता नहीं यह कार्य व्यापार कितने काल पर्यंत चलता रहा । अनायास ही एक जोड़े में उसका आकर्षण हुआ और विना किसी व्यवधान के वह उनमें समा गया । अब वह पायेगा नया कलेवर । सर्व सक्षम । क्रिया, कर्म, कतृत्व शक्ति के साथ । यही तो है ब्रम्हानन्द की परम अनुभूति । और फिर, एक और लम्बी गहन निद्रा...............................।