1
जनमानस
उद्वेलित है
पहले
सरकार,
गैर सरकारी संस्थाएँ,
साहूकार
उनके विकास के लिये
कृत संकल्पित थे
अब उन्हें
नक्सलियों के छॉंव तले
विकास करना है
बाप
पहले के साथ है
बेटा
नक्सलियों के साथ
और
मॉं बेटी सलवाजूडूम केम्प में ।
अब तो
उन्हे भी पता चल चुका है
विकास तो उन्हें करना ही होगा
चाहे धरती पर
चाहे स्वर्ग में
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2
भय
पहले भी नहीं था
उनके जीवन में
अब भी नहीं है
पहले
जंगल में
जिस जिस को
बाघ मिला
वह अपना अनुभव बॉंटने
गॉंव नहीं लौटा
आज जो
अपना दुख भी जाहिर करता है
गॉव में
उसे नक्सली मिलते हैं
अपने ही पहरावे में
अपनी ही भाषा बोलते हुए
अब उन्हें न बाघ से भय है
और
न नक्सलियों से
क्योंकि
वे जान गये हैं
दोनो क्या करते हैं
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3
मेरे भीतर
एक बडा सा पोस्टर टंगा है
जिसमें लिखा है
“बस्तर जाना व्यर्थ है”
सरकारी योजनाएँ
चल नहीं पातीं
अपन तो बालबच्चेदार हैं
घर गृहस्थी कैसे चलेगी ।
आदिवासी सौन्दर्य
किसी कीमती कैमरे में
टापलेस
कैद होने के लिये
अप्रस्तुत हैं
घोटुल का
अघोषित रूप से
सरकारीकरण हो चुका है
अपन तो कलाकार हैं
रंग, व्यापार कैसे चलेगा ।
मेरा जी तो करता है
पोस्टर को
सबकी जानकारी के लिये
बस्तर जाने वाली सडक पर
बीचों बीच
टॉंग दूँ ।
……………………………
शनिवार, 26 दिसंबर 2009
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बहुत सटीक रचनाएँ.
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