रविवार, 29 नवंबर 2009

परियों का देश थाईलैंड







कहते हैं पुरानी पीढ़ी का अनुभव नई पीढ़ी के लिये कथा कहानी या गल्प से अधिक मायने नहीं रखती । वर्तमान का खट्टा मीठा स्वाद सजीव होता है, जबकि भूत जो वर्तमान के काँधे चढ़कर आता है, सूचना बनकर सरोकारों तक बिखरता तो है पर उसमें ताजे फूल की खुशबू नहीं होती । इसे हम चाहे दो पीढ़ीयों का सहज अंतर कहें या कि विकास यात्रा की स्वाभाविक परिणति । ज्ञान सदैव अनुभूति सापेक्ष ही होता है, हालाँकि चेतना के लिये अनुभूति भी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रेषित सूचना ही होती है ।



थाईलेण्ड को मैंने अप्रत्याशित रुप से वर्तमान में पाया । आधुनिकता का जो रंग उस पर चढ़ रहा है वह आश्चर्यजनक है युवा सामने हैं , बुजूर्ग ओझल हैं । पुरातन लोहे से भी अधिक मजबूत सागौन लकड़ी निर्मित छोटे छोटे घर नदारत हैं, गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ विखरी पड़ी हैं, । आधुनिकता की चमक, दमक , आज के बाजार से आकर्षित जीवन शैली और नील गगन में उँचाई पर उड़ते पंक्षी के तरह की उन्मुक्तता थाईलेण्ड के निवासियों के तन और मन दोनो में गहराई तक समायी हुई है । भगवान तथागत यहाँ के प्राणों मे बसे थे , अब मंदिरों तक सीमित रह गये हैं, या फिर उन्होंने गैरिक वस्त्रों में यदा कदा ही प्रकट हो पाने वाले भिक्षुओं की सीमा में रहना सीख लिया है । उनकी शिक्षाएँ मंदिरों के गर्भगृहों में भविष्य के लिये जब देश निकट अतीत की गरीबी और निशक्तता से उबर जायेगा, सुरक्षित रख लिये गये हैं । पुरुष वर्ग निर्यातोन्मुख कल कारखानो की दिनोंदिन बढ़ती इकाईयों में खप गया है और महिलाएँ पर्यटन उद्योग की निरन्तर बढ़ती आवश्यकता के अनुरुप सेवा के हर क्षेत्र में अपने गौरवर्णीय छबि और चेहरे पर हर समय खेलती मंदस्मित लिये सन्नद्ध हो गई हैं । इस क्रियाकलाप में शरीर को भोग की वस्तु के रुप में परोसकर अपनी आर्थिक सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करने में किसी नैतिक बंधन को अस्वीकार करने में उन्हें कत्तई भी हिचक नहीं होती । यह सब कुछ यहाँ के स्त्री वर्ग के लिये सहज रुप में स्वीकार्य है । स्त्री सुलभ लाज की लाली यदा कदा आकर्षण को और अधिक प्रभावी करने की भंगिमा के रुप में उभरते दिखती है , अन्यथा इनका निर्विकार चेहरा उनके किसी मशीन की तरह की संलग्नता को प्रदर्शित करती है ।



पहली बार में तो भारतीय मानस, जिसमें मर्यादा, नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और आदर्शों की छाप पीढ़ी दर पीढ़ी उतरती आ रही है , थाईलेण्ड जाकर अचम्भित हो जाता है । उसका वर्जनाओं में जीने वाला मन एकाएक उन्मुक्त होने में संकोच का अनुभव करता है । हालाँकि उन्मुक्तता का अपना अलग स्वाद और आकर्षण है जो आखिरकार उसे उसके संकोच से बाहर ले ही आती है । उँची उँची अट्टालिकाएँ, मीलों लम्बी फ्लाईओवरों और जाम में फंसी विदेशी कारों की लम्बी कतारें विकास के पथ पर दौड़ती अर्थव्यवस्था का भान कराती हैं, परन्तु जब विदेशी निवेश और सैलानी आधारित अर्थतंत्र के चमक दमक का तथ्य सामने आता है, तथाकथित विकास का पोल खुलती दिखती है । लगता है थाईलेण्ड के पास खेत खलिहान, आकर्षक समुद्री तट और सुन्दर, आमन्त्रण देती थाई देह की ही पूंजी है ।



थाईलेण्ड का ज्ञात इतिहास मात्र ७५० वर्षों का ही है । उसके पहले लगभग अंधकार युग था । इस देश में भगवान बुद्ध का संदेश इसी अंधकार युग में आया और फैला था । भारतीय संस्कृति के अवशेष भी जहाँ तहाँ आज भी दिखलाई पड़ जाते हैं , परन्तु शायद थाई वासियो को अब इसका ज्ञान नहीं रहा । आज तो भगवान बुद्ध थाई हैं और भगवान राम भी थाई हैं । थाईलेण्ड में अयोध्या । अयुधाया । नामक एक शहर है, जो अतीत में इस देश की राजधानी रही है । भारत में हों या न हों पर यहाँ के राजा आज भी राम ही हैं । वर्तमान राजा नौवे रामा कहे जाते है ।



अपने अतीत से, इतिहास से कटकर किसी समाज या राष्ट्र की क्या दुर्दशा होती है ? थाईलेण्ड इसका जीवंत उदाहरण है । इस देश की इस अवस्था के लिये अन्य कारकों में ब्रिटिश, फ्रेंच, डच और अमरीकियों द्वारा किया गया आर्थिक और सामाजिक शोषण रहा है । अमरीकियों ने तो इस देश के निवासियों का दैहिक शोषण कर इनको नैतिक अवमूल्यन के गहरे अंधे कुएँ में धकेल दिया, जहाँ से संसार दिखना बंद हो गया और इन्होने अपनी स्थिति से समझौता कर इसे ही सच मान लिया । भगवान जाने नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना इस देश में कब हो पायेगी, या कि हो भी पायेगी कि नहीं । कुछ कहा नहीं जा सकता भविष्य के आँचल में क्या छुपा है । हाँ यह जरुर है, आज इस देश ने अपनी निशक्तता, जिसके कारण अपनी महिलाओं को अमरीकी दैहिक शोषण से नहीं बचा पाये थे , को इन्होने अपना हथियार बना लिया है और उन्हीं अमरीकियों को काम जाल में फाँस कर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारते हुए उनमें नैतिक अवमूल्यन का बीज बो रहे हैं इस फाँस में भारतीय सैलानियों का उलझना अवश्य ही चिन्ता का विषय है



दक्षिण पूर्वी एशिया के इस छोटे से देश के निवासियों का रंग युरोपियन गोरेपन से उन्नीस ही बैठता है । कद काठी में इनकी गणना सामान्य से कुछ छोटे कद की ही की जायेगी । सन्तुलित देह और मीठी जुबान इनकी सुन्दरता को चार चाँद लगा देता है । आम कामकाजी स्त्रियाँ आकर्षित तो करती ही हैं और जब श्रृँगार व परम्परागत नृत्य की वेशभूषा में ये मँच पर उतरती हैं तो परियों से कम नहीं लगतीं । एक बात जरुर अनुभव होती है, वह है थाई सुन्दरियों के तरकस में कामदेव के वाणों की अनुपस्थिति । ये आकर्षित तो करती हैं परन्तु घायल नहीं करतीं । ये न तो कटाक्ष के तीर चलाने!मारने में उस्ताद हैं और न रुपगर्विता के से भाव रखती हैं ।



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1 टिप्पणी:

  1. आप ने सच कहा है...ऊपरी चमक दमक के नीचे सडांध मारती गन्दगी है...देह व्यापार सर्वोपरि है और गुंडा गर्दी भी कुछ कम नहीं...अमेरिकी योरोप चीनी और जापानियों ने मिल कर इन का खूब देह शोषण किया है और अब तो भारतीय भी पीछे नहीं रहे...
    नीरज

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