गुरुवार, 4 जून 2009

सावधान प्रदूषण अपनी विकरालता में दिनोदिन बढ़ोत्तरी करता चला जा रहा है

आज हम चारों तरफ से समस्याओं से घिरे हुए हैं । सर्वव्यापी वायु प्रदूषण अपनी विकरालता में दिनोदिन बढ़ोत्तरी करता चला जा रहा है । ध्वनि प्रदूषण की मात्रा तथा भयावहता सीमा तोड़ती नजर आ रही है । आसपास सड़कों पर कचरा बिखरा रहता है । नालियाँ कचरे से जाम हो गई हैं । नालियों में गंदा पानी बहता नहीं , वरन् रुकावट के कारण बजबजा रहा है । मच्छड़ और मक्खयों को पनपने के लिये आदर्श स्थान मिल गया है । हमारा प्यारा आशियाना कचरा और गन्दगी के बीच टापू सा बन चला है । टी व्ही तथा हमारी जीवन शैली ने पास पड़ोस में सम्पर्क को समाप्त प्राय कर दिया है जिससे कालोनियों में दोपहर के समय सन्नाटा पसर जाता है और असमाजिक तत्वों को खुल खेलने का मौका मिल जाता है ।

ये सब समस्याऐं हमारी अपनी पैदा की हुई हैं । हम भले ही इसका दोष किसी और पर मढ़कर आत्म संतोष की मृगमरीचिका में अपने को बहला लें, पर सत्य तो यही है कि अपने जीवन को कठिन से कठिनतर बनाने के लिये हम ही जिम्मेदार हैं । हाँ , यह अवश्य है कि नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियाँ आदि सार्वजनिक हित साधन करने वाली संस्थाऐं भी अपनी अकर्मण्यता के साथ इस स्थिति को पैदा करने में हमारा भरपूर सहयोग करती रही हैं ।

हम नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियों को इस अव्यवस्था के लिये जिम्मेदार ठहराकर दो चार गालियाँ देकर अपने कर्तव्य की इति श्री मान लेते है। ज्यादा हुआ तो संबंधित अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करा देते हैं अथवा दस पच्चीस रुपया खर्च करके कभी कभार आस पास साफ सफाई करवा लेते हैं । इससे समस्या का समाधान नहीं हो जाता ।

प्रदूषण , गंदगी का यह भयावह मंजर रुकने का नाम नहीं लेगा जबतक कि इसके बिरुद्ध नगरनिगम , म्युनिसीपेलिटी , सरकार की अन्य एजेंसियों के साथ साथ हम और आप एकजुट होकर अभियान न छेड़ दें । आज जरुरत है कि हम आत्म अनुशासन का पाठ फिर से पढ़ें तथा अपने परिवार के सभी सदस्यों को भी साथ लेकर उपरोक्त समस्याओं के पैदा होने वाले कारकों पर कुठाराघात करें, ताकि इन्हें पैदा होने और पनपने का मौका ही न मिले ।

सार यह है कि समस्याओं के निराकरण के लिये हमारा पहल अपेक्षित है । कष्ट हमें है और कष्ट के निदान का उपाय भी हमारे पास है । क्यों न आप और हम नैदानिक उपायों को अमल में लाने की शुरुआत आज ही से करें ।

मंगलवार, 2 जून 2009

समय प्रबंधन

कहीं पढ़ा था कि जापानी लोगों के शब्दकोश में लेट|बिलम्ब शब्द नहीं है । समय की पाबंदी उनका सहज स्वभाव है। समय पर सारे कार्य करना उनकी परम्परा है । यदि कोई कहीं देरी से पहुँचता है तो उसे लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। ज्यादा देरी तो उसका काम ही बिगाड़ देती है ।

अपने देश की दशा ठीक इसके विपरीत है । जो जितना ही बड़ा होता है वह उतनी ही देरी करता है, जैसे कि इन्तजार कराने से उसकी महत्ता में बढ़ोत्तरी होती हो । नेताजी स्वयं आमसभा आयोजित कराते हैं और अकसर स्वयं देर से पहुँचते हैं । अधिकारी देर से आफिस आते हैं । आफिस समय के बाद देर तक बैठते हैं । कर्मचारी , मजदूर काम पर देर से पहुँचते हैं परन्तु छुट्टी समय पर कर लेते हैं । कुल मिलाकर हर क्षेत्र में देर करने का चलन है ।

देरी से उपजी वेदना का नजारा देखना हो तो उन अभियुक्तों को देखिये को न्याय प्रक्रिया में देरी के कारण बरसों जेल में अनावश्यक कष्ट भोगते रहते हैं ,बाद में बेदाग बरी हो जाते हैं ।

किसी एक्सीडेन्ट में चोट खाये इन्सान को देखिये जो सहायता में देरी या इलाज में बिलम्ब के कारण या तो अपंग हो जाता है या प्राण छोड़ देता है ।

प्राकृतिक आपदा की घड़ी में या दंगा फसाद के समय सरकारी मशीनरी के देरी करने के कारण कितनों को ही अपने जीवन से हाथ धोना पड़ जाता है ।

सरकार की बड़ी बड़ी जनकल्याणकारी योजनाऐं देरी के चलते या तो अपना उद्देश्य खो बैठती हैं या फिर क्रियान्वयन लागत में इतनी बढ़ोत्तरी हो जाती है कि उसे छोड़ना तक पड़ जाता है और एक बड़ी राशि व्यर्थ हो जाती है ।

सार यह है कि विलम्ब के कारण हमें कुछ वर्षों से लेकर जीवन भर की वेदना सहनी पड़ सकती है तथा कभी कभी व्यापक जन धन की हानि भी उठानी पड़ सकती है । अतः , आइये आप और हम समय पाबन्दी की शुरुआत करें ।